इस कविता में लेखिका एक बालिका के रूप में जन्म लेने के पश्चात खुद के वजूद को तलाशती है।तो बेटी,बहिन,पोती,पत्नी,मां,भाभी,देवरानी, जेठानी,ननद आदि कई रिश्तों के जरिये ही खुद का परिचय पाती है ।किन्तु वह स्वतंत्र रूप से कौन है?क्यों है?ये नहीं जान पाती।खुद को बिना अस्तित्व के पाती है।इसलिए खुद को अजन्मी कहती है। अजन्मी मैं जन्मी पर,अजन्मी ही रही। गर्भ में थी ,गर्भ में ही रही। जन्मी भी मैं,पर जन्मी ही नहीं। जो जन्मी,बेटी थी वो बहिन थी,पोती भी थी वो। मां के गर्भ से रिश्तों के गर्भ में गयी। मां की नाभि से छूटी तो, रिश्तों की नाभि से जुड़ी अपनी सांसों के लिए घुटती ही रही। पहचान अपनी खोजती ही रही। डूबती उतरती रही , रिश्तों के भंवर में। तलाशती रही वजूद अपना मगर जन्म न ले पायी अजन्मी ही रही मैं । छटपटाती रही , जन्म लेने के लिए। रिश्तों के गर्भ में। मगरअजन्मी ही रही । जन्मी ही नहीं मैं।। अनीता ध्यानी 31/07/2021
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कोरोना से डरो न तुम
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कोरोना से डरो न तुम मौत से पहले मरो न तुम। स्वच्छ रखो घर ,स्वच्छ तन मन। हाथ धोने का करो जतन। न्यूज t v पर लो तुम सुन न्यूज पेपर भी कर दो बंद। परिवार संग जी लो जीवन जन सम्पर्क कर लो कुछ कम। सामाजिकता यूँ जारी रखना ऑनलाइन सम्पर्क बनाये रखना। सात्विक सब भोजन करना तामसी भोजन तुम त्यज देना । भीड़ भाड़ से रहना दूर भूलकर भी न जाना टूर। जहां तुमसे न धुल पाएं हाथ सेनेटाइजर हरदम हो साथ। अगर किसी को दो हौसला एक मीटर का रखो फासला। सुबह उठ दीर्घ श्वास भर ईष्टदेव स्मरण करना। नित कर्मों से निवृत हो प्राणायाम फिर नित करना। परिवार संग बैठ करना बातें सत पार्टी,पिक्चर की सोचना मत। बोर अगर हों घर बैठे तो पुस्तक निकाल तुम पढ़ना झट। पढ़कर ज्ञान बढ़ेगा अपना पुस्तक से मुंह मोड़ना मत। नशीहत इतनी देता कोरोना विषाणु है या शिक्षक कोरोना? आध्यात्म की ओर बढ़ता इंसान बेबस खड़ा दूर विज्ञान।। अनीता ध्यानी (अनि) 20/03/2020 G P S देवराना यमकेश्वर पौड़ी गढ़वाल ...
*मैं समय हूं*
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*समय के साथ मनुष्य ने बहुत उन्नति की है।आदिमानव के जीवन से आगे बढ़ते -बढ़ते आज चाँद पर जा पहुंचा है।दूसरे ग्रहों पर जाने की तैयारी में हमेशा मशरूफ रहता है।* *मनुष्य को लगता है वह उत्तरोत्तर विकास कर रहा है। लेकिन यह भूल जाता है विकास और विनाश साथ -साथ चलते हैं।विकास का खामियाजा प्रकृति को भुगतना पड़ता है।प्रकृति जब परेशान होकर थोड़ी सी आंख तरेरती है तो मनुष्य सूखे पत्ते की भांति बिखर जाता है।विज्ञान और विकास धरे के धरे रह जाते हैं। प्रकृति समय के साथ मिलकर समय -समय पर मानव को सबक सिखाती रहती है। इसी पर आधारित मेरी यह कविता जिसका शीर्षक है ......* *मैं समय हूँ* मैं समय हूं ,देख रहा हूँ। वर्तमान की छाती पर इतिहास लिख रहा हूँ। विश्व को एक हथकड़ी में बांध रहा हूँ। मैं समय हूं,जाग रहा हूँ। विज्ञान से आगे आगे मैं भाग रहा हूँ। साधना को साध रहा हूँ। मैं समय हूं, सिसक रहा हूँ। बिलख रहा हूँ लाशों पर मजबूरों की मजबूरी पर। कराहती आवाजों पर। छटपटाती सांसों पर। मैं समय हूं, बह रहा हूँ निरन्तर अथक । ध्वस्त की मैंने सीमाएं सारी। पड़ा मनु औल...